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श्रीरामचंद्र पथ गमन न्यास द्वारा ‘अरण्यवासी श्रीराम व्याख्यानमाला’ दीनदयाल शोध संस्थान में सम्पन्न

admin
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⚡चित्रकूट सती एवं तप, त्याग की भूमि है इसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता

चित्रकूट। मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग के श्रीरामचंद्र पथ गमन न्यास, भोपाल द्वारा शुक्रवार को उद्यमिता विद्यापीठ, दीनदयाल शोध संस्थान, चित्रकूट के डॉ. राममनोहर लोहिया सभागार में ‘अरण्यवासी श्रीराम व्याख्यानमाला’ – ‘‘शाश्वतम्’’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ प्रभु राम की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीपप्रज्ज्वलन के साथ किया गया।

कार्यक्रम में अतिथि के रूप में गायत्री शक्तिपीठ के प्रबंधक डॉ रामनारायण त्रिपाठी, चित्रकूट के प्रसिद्ध कथावाचक नवलेश दीक्षित, जानकी महल के महंत सीता शरण दास जी, महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ भरत मिश्रा, बांदा चित्रकूट के पूर्व सांसद आरके सिंह पटेल, दीनदयाल शोध संस्थान के राष्ट्रीय संगठन सचिव ज्ञान महाजन, कोषाध्यक्ष वसंत पंडित, नगर परिषद चित्रकूट की अध्यक्ष साधना उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान अमित यादव उप संचालक श्रीरामचन्द्र पथ गमन न्यास द्वारा सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह प्रदान किये गए।अपने उद्बोधन में प्रसिद्ध कथावाचक नवलेश दीक्षित ने कहा कि ब्रम्हांड का सबसे बड़ा तीर्थ चित्रकूट है ,साथ ही मर्यादा पुरुषोत्तम राम स्वयं धर्म के स्वरूप हैं। प्रभु राम का जीवन हमें प्रेरणा देता है कि परिस्थितियां कैसी भी हो मनःस्थिति अच्छी होनी चाहिए जिससे सभी लड़ाइयां हम जीत लेंगे। राम के जीवन का प्रत्येक कार्य दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो आत्म-सुधार और बेहतर समाज के निर्माण का संदेश देता है। प्रभु राम ने  सत्य, प्रेम, करुणा और समतामूलक समाज की स्थापना पर जोर दिया है, जिसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में मिलता है। आज का युवा भौतिकता के विकास की ओर ज्यादा भाग रहा है जबकि आध्यात्मिक विकास में पीछे होता जा रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि हम भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल न होकर आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विकास के मॉडल को अपनाएँ।कुलगुरु प्रो भरत मिश्र ने कहा कि जन जन के हृदय में विराजने वाले राम है, राम सबके आराध्य हैं। राम जी चित्रकूट नहीं आते तो वह सिर्फ राजा राम होते ना कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान प्रभु श्रीराम, मर्यादाओं का उल्लंघन कभी न करने का पाठ हमें प्रभु राम से ही सीखने को मिलता है। राम ने सभी को स्वाभिमानी एवं स्वावलम्बी बनाने का कार्य किया उन्होंने जनमानस की ताकत और समर्थ का परिचय कराया जिससे समाज एकजुट होकर आत्मनिर्भर बना।महंत सीताशरण दास जी ने कहा कि राम ने राक्षसों के विनाश के लिए वनवास नहीं लिया वह तो अपने संकल्प मंत्र से संघट का कार्य कर सकते थे, प्रभु राम ने सामाजिक समन्वय एवं समरसता के लिए वनवास को ग्रहण किया है हमें सबको उनके जीवन चरित्र से प्रेरणा लेकर अपने सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन को बेहतर बनाना चाहिए।मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार रखते हुए डॉ रामनरायण त्रिपाठी प्रबंधक गायत्री शक्तिपीठ ने कहा कि चित्रकूट की महिमा का वर्णन शब्दों में व्यक्त नही किया जा सकता है यह सती की भूमि है तप एवं त्याग की भूमि है। राम ने  सत्य, दया, करुणा, धर्म और मर्यादा के मार्ग पर चलते हुए राज किया, इन्हीं गुणों की वजह से उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। यदि यह कहा जाए कि दशरथ नन्दन राम को मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु राम इस पवित्र भूमि चित्रकूट ने बनाया तो अतिशय नही होगा। राम का जीवन धर्म का सूत्र बन जाता है, राम ने सभी संस्कृतियों एवं सभ्यताओं के बीच समन्वय का कार्य किया। उन्होंने दण्डकारण्य को पवित्र किया। राम का जीवन चरित्र मानव सभ्यता के विकास के लिए अनुकरणीय है। राम का जीवन दर्शन केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि सत्य, मर्यादा, धर्म और मानवतावादी मूल्यों का एक व्यावहारिक आचरण है, जो रामायण जैसे महान महाकाव्य के माध्यम से भारतीय सभ्यता को प्रेरित करता है।

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अध्यक्षीय उद्बोधन करते हुए दीनदयाल शोध संस्थान के राष्ट्रीय संगठन सचिव अभय महाजन ने कहा कि चित्रकूट का महात्म्य चारो युगों में रहा है। राम का जीवन दर्शन मुख्य रूप से ‘मर्यादा’ पर आधारित है, जिसे वह पुत्र, पति, भाई और राजा के रूप में पूरी निष्ठा से निभाते हैं, और ‘धर्म’ के सिद्धांतों का पालन करते हैं। जो हर इंसान के हृदय में निवास करता है और सत्य, धर्म, मर्यादा जैसे सात्विक गुणों का प्रतीक है। “राम” नाम सभी आंतरिक बुराइयों (जैसे आलस, क्रोध, मोह) को दूर करता है और आत्मा के आंतरिक प्रकाश को जागृत करता है, जिससे व्यक्ति को परम संतुष्टि और आनंद की प्राप्ति होती है। सम्पूर्ण जनमानस की अपेक्षाएं है कि धर्मनगरी का विकास उसके मूलस्वरूप को बरकरार रखते हुए किया जाए। भारत अनादिकाल से अपने गौरवशाली परम्परा सँस्कृति एवं सभ्यता के कारण विश्व गुरू, विश्वबन्धुत्व का केंद्र रहा है। 

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